Hindi Kahani - एक इंतज़ार का अंत !! - Hindi Kahani - मनु की कहानियां !!

Breaking

इस ब्लॉग में Hindi Kahani, Hindi Kahaniya, Hindi kahani lekhan, Short Stories for kids और आपके मनोरंजन के लिए लिखी गई विभिन्न प्रकार की काल्पनिक कहानियां शामिल हैं...

रविवार, 1 नवंबर 2020

Hindi Kahani - एक इंतज़ार का अंत !!


मैं एक सेवा निवृत पुलिस अधिकारी हूँ। ये कहानी मेरे जीवन की एक बेहद रहस्यमई घटना है। जो मैं आज आपसे साझा करने जा रहा हूँ। 

बात उन दिनों की है जब मेरी पहली ही पोस्टिंग दिल्ली के एक बाहरी इलाके में कर दी गई। मैं एक ईमानदार और कर्त्यव-पारायण अधिकारी था। मैने पहले ही दिन से सभी अनसुलझे मामलों की फाइल अपने कार्यालय में मंगवा ली और उनकी जांच शूरू कर दी। लगभग पुरा ही दिन मैने उन फाइल्स को पढ़ने और जांचने में लगा दिया, समय का पता ही नही चला। ये नवंबर के महीने की आखिरी हफ़्ते की बात थी। मेरे चपरासी ने अकर मुझसे पुछा, "साहब क्या आप और रुकंगे यहाँ ?" तब मुझे ये एहसास हुआ की दिवार पर लगी घड़ी शाम के 7.30 बजा रही थी। मैने थोड़ा हिचकिचाते  हुए कहा, " नहीं नहीं,बस अभी चलते हैं।" और मैं अपनी सरकारी अम्बेस्डर गाड़ी में बैठा और ड्राइवर को घर चलने को कहा। रास्ते भर मेरे दिमाग में एक केस कांटे की भांती अटक गया था। 


इस केस में पिछले लगभग 10 साल में बाहरी सड़क के आस पास और एक लड़कों के छात्रावास में लगभग 12 लोग रहस्यमई ढंग से गायब हुए थे और फिर कभी नही मिले। ये सारी घटना एक निश्चित इलाके में ही हुई थी। लेकिन ये किसने किया और क्यों किया, कुछ भी पता नही चल पाया था। सोचते सोचते कब घर आ गया, पता ही ना चला। घर में आते ही मैने आवाज़ लगाई, "नंदिनी, एक कप गरम कड़क चाय पिला दो प्लीज़।" सामने से जवाब आया, "अभी लाई, लगता है पहले ही दिन तुमने कोई मामला खोज निकाला है, जो तुम अपने साथ घर तक ले आऐ हो।" इतना कहकर वो मुस्कुरा दी और मैने भी एक हल्की सी मुकुरहाट से अपनी सहमती जता दी थी। रात को भी मैं उसी केस के बारे में सोचता रहा। घड़ी की सुइयां रात के 2 बजा रही थी। फिर ना जाने कब मेरी आंख लग गई। सुबह नंदनी ने मुझे उठाया। शायद अलार्म घड़ी की अवाज से भी मेरी नींद नही खुली थी। 


मैं जल्दी से कार्यालय के लिये तेैयार हुआ और जाते ही सबसे पहले गायब हुए लोगों के केस की छानबीन शुरू कर दी। मैने पुराने जांच अधिकारी से बात की तो पाया की मामले में सिर्फ एक ही चश्मदीद गवाह था। मैने तुरंत उसके घर का पता लिया और जा पहुंचा पुछताछ के लिये। वो करीब 60-65 साल के बुजर्ग व्यक्ति थे। जो ट्रक चलाया करते थे। उनका साथी क्लीनर भी उसी रास्ते पर गायब हुआ था। मैने उनसे पुछा की क्या हुआ था उस दिन। 


उन्होंने बताया की, रात के करीब 1 बजे होंगें, और उनके ट्रक के सामने शायद कोई लड़की अचानक से आ गई और उन्होंने एकदम से ब्रेक लगा दिए। फिर उन्हें एक आदमी की आवाज आई जो की उन्हें नीचे उतरने को कह रहा था, मगर नज़र नही आ रहा था। उनका क्लीनर जब नीचे उतरा ये पता करने की कौन आवाज़ दे रहा है, फिर वो दोबारा कभी नजर नही आया। लगभग तुरंत ही ड्राइवर भी नीचे आ गया था, लेकिन वो कहाँ ग़ायब हुआ, कुछ पता ना चला। यही सब पुलिस की फाइल में भी दर्ज था। गायब हुए सभी मामलों में ऐसा ही कुछ हुआ था, पहले किसी लड़की की आवाज़ आती है फिर उसके होने का आभास होता, फिर किसी आदमी की आवाज़ आती। बस इतना ही पता चल पाया था अभी तक।

बाकी के लोग, नज़दीक ही स्तिथ एक लड़कों के छात्रावास से गायब हुए थे। और सभी गायब हुए लोगो की उमर 20 से 25 के बीच ही थी। अगले कुछ दिन मैने छात्रावास में छानबीन करते हुए बिताये। वहां का मालिक एक दिन मेरे पास आया और गिड़गिड़ाने लगा, " साहब, इतनी छानबीन मत कीजिये, नही तो हमारे यहां कोई भी रुकने नही आएगा और हमारा काम ठप हो जाएगा।" मैने उन्हें अश्वासन दिया की, मैं अब अकेले ही उनके छात्रावास में छानबीन के लिये आऊंगा, पुलिस की जीप या फिर कोई पुलिस वाला साथ नही होगा। इस तरह कुछ और महीने बीत गए। मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा ̈रहा था। तब मैने निर्णय लिया की उसी छात्रावास में कुछ दिन रहा जाय। मुझे अंदर ही अंदर ये एहसास हो रहा था, की सब वारदातों का लेना-देना, इसी छात्रावास से है। मैने छात्रावास के मालिक से बात की और कुछ समय के लिये एक कमरा वहां ले लिया। 


मेरी इस बात से नंदनी बहुत  नराज हुई और कहा, "पहले ही आप घर में समय नही देते थे और अब ना जाने कितने समय के लिये वहां रहोगे। " मैने जैसे-तैसे उसे मनाया और छात्रावास में रहने आ गया। मैने वहां रहने के दौरान पाया की यहान पर ज़्यादातर लडके, उच्च सरकारी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उनका लगभग एक ही रूटीन था, सुबह का चाय-नाश्ता नीचे की एक दुकान से आता था, फिर पुरा दिन पढ़ाई, शाम का नाश्ता और फिर रात को पढ़ाई। कभी-कभी यहां के लड़के रात को देर रात तक पार्टी भी किया करते। मैने यहां कुछ असामान्य नहीं पाया। मैं भी अक्सर नीचे जाकर चाय की दुकान पर बैठ जाता और घंटों वहीं बैठा रहता। अब तो चाय वाले से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। 


वो एक 55-60 साल के बेहद सुलझे हुए व्यक्ति थे। बाल सफ़ेद हो चुके थे, पतला शरीर और आंखों में जैसे किसी का इंतेज़ार। मैं अक्सर उनसे यहां के लड़कों के बारे में पूछता रहता। अब हमारी अच्छी जमने लगी थी। एक दिन मैने उनसे कहा, " बाबा मैं अब कल यहां से चला जाऊंगा। लगता है, जिस काम के लिये आया  था, वो काम तो पुरा हुआ नही "। तब उन्होंने कहा, "तुम से एक रिश्ता सा जुड़ गया था बेटा। आते रहना। " मैने उनसे पुछा, "बाबा, क्या आपका कोई नहीं है ?" उन्होंने मुझे कोई उत्तर ना दिया, उनकी बूढ़ी आंखें नीचे झुक गयी और शायद उनमें नमी भी आ गई थी। मैने ज़्यादा नहीं पूछा और अपने कमरे में आकर कपड़े पैक करने लगा। पैकिंग करते करते, रात काफी हो गई थी। अब तक दिसंबर का अखिरी हफ्ता आ गया था। ठंड और धुंध दोनो ही बढ़ गए थे। 

Hindi Kahani - एक इंतज़ार का अंत !!

मेरे कमरे की खिड़की खुली हुई थी। उसमे से छन कर आती हुई रोशनी और धुंध के बीच में से एक लड़की की आकृति उभरी। मैं मानो सुन्न पड़ गया था। ऐसा ठंडा एहसास मैंने पहले कभी नही किया था। पुरे कमरे में ठंड अचानक कई गुना बढ़ गई थी और एक भीनी भीनी खुश्बू आने लगी थी। तभी उस लड़की ने कहा, " सर, आज के बाद आपको कोई परेशानी नही होगी। सब पहले जैसा हो जाएगा। " इतना कहकर वो जैसे आई थी, वैसे ही गायब हो गई। अब कमरे में ठंड भी सामान्य हो गई थी। मैं जैसे नींद से जागा, और तेजी से अपने रूम के बाहर भागा। वहां पुरा कॉरिडोर खाली था। बिल्कुल सन्नाटा पसरा हुआ था। मेरे कदमों की आहट सुनाई दे रही थी बस। उस रात मैं जैसे तैसे सो पाया। 

सुबह उठकर मैंने ज्यों ही अपने कमरे का दरवाजा खोला, सामने एक पुलिस कांस्टेबल खड़ा था। उसका चहरा देखकर ही मैं समझ गया था, की कुछ बड़ा हुआ है। उसने मुझे बताया, की कल रात एक बड़े अधिकारी उसी रोड़ से गायब हो गए है। बिना समय गवाएं मैंने जांच शूरू कर दी और मन में एक ही सवाल था, की कब रुकेगा ये सब और कौन है इस सब का ज़िम्मेदार। मैने अधिकारी के ड्राइवर से बात की, उसने भी बिलकुल वही किस्सा सुनाया, जो ट्रक चालक ने सुनाया था। फ़र्क बस इतना था, की इस बार चालक ख़ुद गाड़ी से उतरा था।यहां एक और बात अलग हुई। यहां वो लड़की साफ-साफ नजर आई थी और किसी आदमी की कोई आवाज़ नही आई थी। मैने गाड़ी के चालक से उस लड़की का हुलिया पूछा, वो लगभग वैसा ही था, जैसा मैने अपनी खिड़की पर देखा था, हालांकी मैं लड़की का चहरा नही देख पाया था। मैने चालक के बताये अनुसार एक स्केच तैयार करवाया। जब मैने वो स्केच देखा तो मानो वो बोलता हुआ सा महसूस हुआ।


बड़ी-बड़ी भूरी आँखें, कमर तक लंबे बाल, उजला रंग, सुराही दार गरदन। मैं समझ नही पा रहा था, की इन सब वारदातों की पीछे एक लड़की का हाथ कैसे हो सकता है। खैर, ये एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी के गायब होने का मामला था, ऊपर से भी दबाव आने लगा। मुझे ये मामला सुलझाना ही था। मैंने वो लड़की उस रात छात्रावास में भी देखी थी। हो ना हो, इसका लेना देना इधर से जरूर है। मैने लड़की का स्केच छात्रावास में सभी को दिखाया। लेकिन कोई लाभ नही हुआ। एक और बात सामने आई, की जो अधिकारी गायब हुए थे, वो भी इसी छात्रावास में रहा करते थे, करीब 10 साले पहले। बस इससे ज़्यादा और कुछ पता ना चल पाया। मैने उस लड़की का स्केच अब चाय वाले अंकल जी को दिखाया, क्यूंकि उनकी दुकान वहां क़रीब 20 साल से थी। वो स्केच देखकर वो एक दम रो पड़े और उनकी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। मैंने कारण जानना चाहा तो बदले में उन्होंने अपने पास ही रखी एक फोटो मुझे दे दी। मेरे चेहरे का रंग एक दम सफेद पड़ गया था। कानों में एक सीटी सी बजने लगी थी।


ये तो वही लड़की है, जो मेरे कमरे की खिड़की पर आयी थी और जिसका ज़िक्र अधिकारी के ड्राइवर ने किया था।क्या केस अब हल होने वाला था, पिछले 10 साल का रहस्य अब खुलने वाला था। मेरे कुछ पूछने से पहले ही अंकल जी बोल पड़े, " बेटा, ये मेरी एकलौती बेटी मृणालिनी का फोटो है, जो यहां सरकारी नौकरी की तैयारी के लिये आई थी। और अकसर इस छात्रावास के लड़के उसकी पढ़ाई में मदद किया करते थे। एक रात वो यहीं दुकान से जाने कहां गायब हो गई और आज तक नही मिली। 

मैने और जांच करी तो पता चला की वो लड़की कभी इस क्षेत्र से बहार गई ही नही थी। ना जाने वो कहां ग़ायब हो गई थी। लेकिन फिर वो यहां अक्सर आस पास कैसे नज़र आती है। और उसका इन सब वारदातों से क्या संबंध। मैने 10 साल पहले यहां रहने वाले ने सभी लड़कों से बात  करी तो एक लड़के ने मुझे इस शर्त पर बताया की इस केस में उसका नाम नही आना चाहिये, मृणालिनी को आखरी बार उसने जिस लड़के के साथ देखा था, वो वही अधिकारी थे जो इस बार गायब हुए थे। पुलिस जांच जब चल रही थी तब उनका चयन अधिकारी के लिये हो गया और उनकी पहली ही पोस्टिंग अंडमान निकोबार कर दी गई। उसके बाद शायद उन्होंने अपनी पोस्ट के बल पर ये जाँच पूरी ही नही होने दी और अब 10 साल बाद उनका तबदला वापस इसी शहर में हुआ, जहां से वो खुद गायब हो गए। 

फिर मैने बाकी गायब लड़को के बारे में भी पता किया, तो पाया, वो सभी उच्च अधिकारियों के बेटे थे और उनके खिलाफ़ छेड़-छाड़ की शिकायतें भी आयीं, लेकिन छात्र समझकर या फिर दबाव में कोई एक्शन नही हो पाया था। इस केस को पूर्णतः सुलझाने के लिए मुझे और वक़्त चाहिए था, पर सरकारी अधिकारी के गायब होने से मामला संगीन हो गया था और सरकार ने ये केस जल्दी हल ना करने के कारण मेरा तबादला बिहार कर दिया। मैने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में सभी पहलुओं को लिखा, लेकिन उसे माना नही गया कभी। उसके बाद वहां ऐसी कोई भी वारदात रिकॉर्ड नही की गई। इस केस का सच शायद मैं अंदर ही अंदर  जानता था, मगर उसे लिखता कैसे। कोई सबूत नही था मेरे पास। 


आज मेरी दो लड़कियां है, आकिशा, अनायरा, जिनके साथ मैं अपने दिल्ली वाले घर में नंदिनी के साथ रहता हूँ। मैं एक बाप का दर्द अच्छी तरह समझ सकता हूँ। पुलिस तो इंसाफ नही दिला पाई, लेकिन शायद कुदरत ने अपना इंसाफ कर ही दिया था। यहां मैने अपने पूरे परिवार का नाम बताया, लेकिन अपना नहीं बताया। शायद वो ज़रूरी भी नही है। बस इतना ज़रूर कहूंगा... बुराई का अंत, बुरा ही होता है। जय हिंद !!


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

कृपया Comment बॉक्स में किसी भी प्रकार के स्पैम लिंक दर्ज न करें।